औरैया: समय का पहिया जब घूमता है, तो वह किसी की हैसियत, सत्ता या रसूख नहीं देखता। जनपद की राजनीति और जरायम (अपराध) की दुनिया पर करीब तीन दशकों तक राज करने वाले बाहुबली व सपा के कद्दावर नेता पूर्व एमएलसी डॉ. कमलेश पाठक का हश्र आज इसी शाश्वत सत्य की गवाही दे रहा है। जिस शख्स के नाम से कभी औरैया और इटावा के प्रशासनिक अमले में खौफ और सम्मान का मिला-जुला भाव पैदा होता था, आज वही शख्स गैंगस्टर एक्ट के तहत मुजरिम करार दिया जा चुका है।
- भड़ारीपुर के युवा का 28 साल की उम्र में विधायकी तक का सफर
- ‘मिनी मुख्यमंत्री’ का रुतबा और मुलायम सिंह यादव का ‘संकटमोचक’
- जरायम की दुनिया और ‘माननीय’ का चोला; दर्ज हुए 40 से ज्यादा मुक़दमे
- 15 मार्च 2020 – वह ‘खूनी रविवार’ जिसने औरैया को दहला दिया
- पुलिस का ‘ऑपरेशन क्लीन’ और बाहुबली की ऐतिहासिक गिरफ्तारी
- कोर्ट रूम की जंग, न्याय की पहली जीत और अब हाई कोर्ट जाने की तैयारी
- आगे क्या? ‘डबल मर्डर’ के मुख्य मुकदमे में फैसले का इंतजार


24 मार्च 2026 को औरैया की विशेष एमपी-एमएलए (MP-MLA) कोर्ट ने डॉ. कमलेश पाठक को 6 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाकर उनके उस ‘अभेद्य तिलिस्म’ को तोड़ दिया है, जिसके बारे में कहा जाता था कि उन पर कानून का हाथ कभी नहीं पहुंच सकता। यह कहानी केवल एक राजनेता के जेल जाने की नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की उस सियासी संस्कृति का एक प्रामाणिक दस्तावेज है, जहां खादी और खाकी के बीच बाहुबल पलकर जवान होता है।
भड़ारीपुर के युवा का 28 साल की उम्र में विधायकी तक का सफर
सपा के कद्दावर नेता डॉ. कमलेश पाठक के राजनीतिक जीवन की शुरुआत किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। औरैया जनपद के भड़ारीपुर गांव से ताल्लुक रखने वाले डॉ. कमलेश पाठक ने जब अपने कदम जवानी की दहलीज पर रखे, तब उत्तर प्रदेश की राजनीति मंडल और कमंडल के दौर से गुजरने की तैयारी कर रही थी। उस दौर में राजनीति में बाहुबल का प्रवेश एक आम बात होती जा रही थी। डॉ. कमलेश पाठक ने भी इसी रास्ते को चुना। उनका शारीरिक सौष्ठव, बेबाक अंदाज और हर काम को ‘अपने तरीके’ से करवाने की जिद ने उन्हें जल्द ही इलाके में एक कद्दावर युवा नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
साल 1985 डॉ. कमलेश पाठक के जीवन का सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। महज 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उस दौर में इतनी कम उम्र में विधायक बनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। इस जीत ने डॉ. कमलेश पाठक को उस ‘पावर पॉलिटिक्स’ का चस्का लगा दिया, जहां से वापसी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।


‘मिनी मुख्यमंत्री’ का रुतबा और मुलायम सिंह यादव का ‘संकटमोचक’
डॉ. कमलेश पाठक की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं केवल विधायकी तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने समय की नजाकत को समझा और समाजवादी पार्टी (SP) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेहद करीब पहुंच गए। 90 के दशक में जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में पल-पल सरकारें बनती और गिरती थीं, उस समय डॉ. कमलेश पाठक को मुलायम सिंह यादव के एक भरोसेमंद ‘संकटमोचक’ के रूप में देखा जाने लगा। कहा जाता है कि कई मौकों पर सरकार बचाने और विधायकों को लामबंद करने में डॉ. कमलेश पाठक (Kamlesh Pathak) ने अहम भूमिका निभाई थी। इसी निष्ठा और बाहुबल के इनाम स्वरूप समाजवादी पार्टी ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य (MLC) बनाया। उनका सियासी कद तब अपने चरम पर पहुंच गया, जब साल 2013 में अखिलेश यादव की सरकार में उन्हें दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी गई।
सपा सरकार के दौरान उनका रुतबा इस कदर बढ़ गया था कि स्थानीय लोग और प्रशासनिक अधिकारी दबी जुबान में उन्हें औरैया और इटावा जिले का ‘मिनी मुख्यमंत्री’ (Mini CM) तक कहने लगे थे। लाल बत्ती की गाड़ी, आगे-पीछे पुलिस का हूटर और दर्जनों असलहाधारी साथियों के काफिले के साथ जब ‘मिनी मुख्यमंत्री’ निकलते थे, तो औरैया शहर की ट्रैफिक व्यवस्था अपने आप रुक जाती थी। उनका यह रसूख ही था कि पुलिस महकमा भी उनके खिलाफ किसी शिकायत को दर्ज करने से पहले सौ बार सोचता था।
जरायम की दुनिया और ‘माननीय’ का चोला; दर्ज हुए 40 से ज्यादा मुक़दमे
राजनीति के इस चमकते चेहरे के पीछे एक बेहद स्याह और खौफनाक सच्चाई छिपी थी। डॉ. कमलेश पाठक केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि उन पर ‘भू-माफिया’ और बाहुबली का टैग भी चस्पा हो चुका था। उनके राजनीतिक सफर के समानांतर उनका आपराधिक ग्राफ भी तेजी से ऊपर चढ़ रहा था। अगर इनके आपराधिक इतिहास और पुलिस रिकॉर्ड्स पर विस्तृत नजर डालें तो, औरैया कोतवाली से लेकर आसपास के कई थानों में इनके खिलाफ 40 से अधिक संगीन मुकदमों की एक लंबी फेहरिस्त दर्ज है।


इनमें मुख्य रूप से भारतीय दंड विधान (IPC) की धारा 302 (हत्या), धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 147, 148 और 149 (घातक हथियारों से लैस होकर बलवा व उपद्रव करना), धारा 386 (जबरन वसूली और रंगदारी), धारा 120B (आपराधिक साजिश रचना) और धारा 506 (जान से मारने की धमकी देना) जैसे कई खौफनाक मामले शामिल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, प्रशासन ने समय-समय पर इनके बढ़ते वर्चस्व को तोड़ने के लिए इन पर ‘गुंडा एक्ट’ और ‘गैंगस्टर एक्ट’ जैसी कठोर कार्रवाइयां भी कीं। लेकिन, ‘माननीय’ का चोला ओढ़े होने और सत्ता के शीर्ष तक सीधी पहुंच होने के कारण, उन पर दर्ज ज्यादातर मुकदमे फाइलों में ही दबकर रह गए।
15 मार्च 2020 – वह ‘खूनी रविवार’ जिसने औरैया को दहला दिया
अपराध का घड़ा जब भरता है, तो वह खुद ही फूटता है। डॉ. कमलेश पाठक के जीवन में वह दिन 15 मार्च 2020 (रविवार) को आया। यह वह दिन था जिसने न केवल औरैया को दहला दिया, बल्कि डॉ. कमलेश पाठक के सियासी और आपराधिक साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। शहर के नारायणपुर मोहल्ले में स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर की बेशकीमती जमीन (करीब एक बीघा) को लेकर डॉ. कमलेश पाठक का पेशे से अधिवक्ता मंजुल चौबे के साथ पुराना विवाद चल रहा था। मंजुल चौबे इस मंदिर के पुजारी परिवार से ताल्लुक रखते थे और जमीन पर पाठक के कथित कब्जे का पुरजोर विरोध कर रहे थे।
रविवार की उस मनहूस दोपहर को जब विवाद बढ़ा, तो डॉ. कमलेश पाठक अपने भाई पूर्व ब्लॉक प्रमुख संतोष पाठक, रामू पाठक और दर्जनों असलहाधारी साथियों के साथ मौके पर पहुंच गए। दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई और फिर जो हुआ, वह औरैया के इतिहास का एक काला अध्याय बन गया। दिनदहाड़े, शहर के बीचों-बीच अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई। इस गोलीबारी में अधिवक्ता मंजुल चौबे और उन्हें बचाने आई उनकी सरकारी शिक्षिका बहन सुधा चौबे को गोलियों से छलनी कर दिया गया। दोनों भाई-बहन की मौके पर ही तड़प-तड़प कर बेहद दर्दनाक मौत हो गई।
पुलिस का ‘ऑपरेशन क्लीन’ और बाहुबली की ऐतिहासिक गिरफ्तारी
एक वकील और एक महिला शिक्षिका की दिनदहाड़े हत्या ने पूरे प्रदेश में भूचाल ला दिया। वकीलों ने सड़कों पर उतरकर भयंकर प्रदर्शन किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस ‘डबल मर्डर’ को सीधे कानून-व्यवस्था को चुनौती माना और औरैया पुलिस को ‘फ्री हैंड’ दे दिया गया। घटना के कुछ ही घंटों के भीतर, जिस पुलिस को कभी डॉ. कमलेश पाठक के घर जाने में पसीना आता था, उसी पुलिस ने उनके घर को छावनी में तब्दील कर दिया। पुलिस ने डॉ. कमलेश पाठक, उनके दोनों भाइयों और गैंग के 11 अन्य सक्रिय साथियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 11 जुलाई 2020 को पुलिस ने इस पूरे कुनबे पर ‘गैंगस्टर एक्ट’ की सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज कर इनकी करोड़ों की नामी-बेनामी संपत्तियों को कुर्क करने का ऐतिहासिक अभियान शुरू किया।
कोर्ट रूम की जंग, न्याय की पहली जीत और अब हाई कोर्ट जाने की तैयारी
करीब चार साल तक चली कानूनी लड़ाई में इस बार गवाह नहीं टूटे। मृतक अधिवक्ता के भाई और वादी संजय चौबे ने अदालत में मजबूती से पैरवी की। अंततः, 24 मार्च 2026 को विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश ने वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसका औरैया की जनता को बरसों से इंतजार था। अदालत ने गैंगस्टर एक्ट के मामले में साक्ष्यों और गवाहों को पुख्ता मानते हुए सपा के कद्दावर नेता डॉ. कमलेश पाठक को 6 वर्ष के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। उनके गैंग के 8 अन्य साथियों को भी 5-5 वर्ष की कैद और 50-50 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया है।

हालांकि, इस बड़े फैसले के बाद डॉ. कमलेश पाठक के खेमे में हलचल तेज हो गई है। ताज़ा अपडेट के अनुसार, पूर्व एमएलसी के परिजनों और उनके वकीलों ने एमपी-एमएलए कोर्ट के इस फैसले को उच्च न्यायालय (High Court) में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। परिजनों का स्पष्ट रूप से कहना है कि उन्हें निचली अदालत के इस फैसले से निराशा हुई है और वे न्याय के लिए अब हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका दावा है कि इस मामले में बचाव पक्ष के कई अहम साक्ष्यों और दलीलों की अनदेखी की गई है।
आगे क्या? ‘डबल मर्डर’ के मुख्य मुकदमे में फैसले का इंतजार
यह समझना बेहद जरूरी है कि यह सजा केवल ‘गैंगस्टर एक्ट’ (संगठित अपराध करने का गिरोह बनाने) के तहत हुई है। 15 मार्च 2020 को हुए उस नृशंस ‘दोहरे हत्याकांड’ (IPC की धारा 302) का मुख्य मुकदमा अभी भी अदालत में विचाराधीन है। इस गैंगस्टर एक्ट की सजा ने उस मुख्य हत्या के मुकदमे के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर दिया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि हत्या के मुकदमे में जिस तरह से वैज्ञानिक साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज हुए हैं, उसमें डॉ. कमलेश पाठक और उनके साथियों का बचना लगभग नामुमकिन है। परिजनों द्वारा हाई कोर्ट का रुख करने के बावजूद, औरैया की अवाम की नजरें अब उसी ‘डबल मर्डर’ केस के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।
‘Auraiya Times’ की यह विस्तृत रिपोर्ट केवल एक राजनेता की दास्तान नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक है। जब हम किसी जनप्रतिनिधि को कानून से ऊपर समझने लगते हैं और उसे ‘मिनी मुख्यमंत्री’ जैसे तमगों से नवाज देते हैं, तो नारायणपुर जैसी दुखद घटनाएं जन्म लेती हैं। डॉ. कमलेश पाठक का रसूख एक दिन में नहीं बना था; यह उन तमाम अधिकारियों, राजनेताओं और समर्थकों की चुप्पी का नतीजा था जिन्होंने उनके अपराधों को नजरअंदाज किया। आज जब कानून ने अपना काम किया है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि सत्ता का नशा चाहे जितना गहरा हो, न्याय की सुबह एक न एक दिन जरूर होती है। यह फैसला उन तमाम मजलूमों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो बाहुबलियों के डर से कभी थाने की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाते थे।
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