औरैया। यमुना किनारे की हवा, आसपास फैला बीहड़ और दूर तक पसरी खामोशी… इसी माहौल के बीच इन दिनों कुछ ऐसा आकार ले रहा है, जो आने वाले समय में औरैया की पहचान बदल सकता है। शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर मंगलाकाली मंदिर के पास ‘खिलमिल पार्क’ तैयार किया जा रहा है।
पहली नजर में यह एक सामान्य पार्क जैसा लग सकता है, लेकिन इसकी कल्पना थोड़ी अलग है। यहां बच्चों के खेलने और परिवारों के घूमने के इंतजाम तो होंगे ही, साथ में कबाड़ और वेस्ट मैटेरियल से तैयार कलाकृतियों के जरिए दुनिया की मशहूर इमारतों और औरैया की अपनी विरासत को एक ही जगह दिखाने की कोशिश की जा रही है।

यानी जिस चीज को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं, वही यहां आकर्षण का हिस्सा बनने वाली है।
📌 एक नजर में खिलमिल पार्क
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| नाम | खिलमिल पार्क / Waste to Wonder Park |
| स्थान | मंगलाकाली मंदिर के पास, यमुना किनारे, औरैया |
| योजना | मुख्यमंत्री नगरोदय योजना |
| मुख्य थीम | Waste to Wonder |
| प्रमुख आकर्षण | दुनिया के सात अजूबों की प्रतिकृतियां |
| विरासत जोन | स्थानीय धार्मिक व ऐतिहासिक धरोहर |
| किड्स जोन | झूले, फिसलपट्टी व थीम आधारित खेल उपकरण |
| अन्य आकर्षण | सेल्फी प्वाइंट और विभिन्न थीम |
| कारीगर | अलग-अलग राज्यों से आए कारीगर |
| स्थिति | जुलाई 2026 तक निर्माणाधीन |
| प्रवेश शुल्क | आधिकारिक रूप से अंतिम जानकारी उपलब्ध नहीं |
| उद्घाटन | आधिकारिक तारीख की पुष्टि उपलब्ध नहीं |
बीहड़ की पहचान से पर्यटन की नई कहानी तक
औरैया की पहचान लंबे समय तक यमुना, बीहड़ और चंबल क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी रही है। वक्त बदला, हालात बदले और अब इसी इलाके को एक नई दिशा देने की कोशिश दिखाई दे रही है।
खिलमिल पार्क के लिए यमुना नदी के किनारे शेरगढ़ घाट और मंगलाकाली मंदिर के आसपास की जमीन को चुना गया। शुरुआती परियोजना विवरणों में करीब सात एकड़ जमीन का उल्लेख मिलता है। बाद के कुछ स्रोतों में इससे बड़ा क्षेत्र बताए जाने के कारण क्षेत्रफल के आंकड़े को अंतिम मानने के बजाय आधिकारिक परियोजना रिकॉर्ड के संदर्भ में देखना बेहतर होगा।
मगर जमीन का आंकड़ा चाहे जितना हो, इस जगह का चयन अपने आप में दिलचस्प है। एक तरफ यमुना और धार्मिक स्थल हैं, दूसरी तरफ बीहड़ का प्राकृतिक परिवेश। ऐसे स्थान पर मनोरंजन और पर्यटन की सुविधा तैयार करने का मतलब है कि आने वाले समय में यहां सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों से भी लोग पहुंच सकते हैं।
कचरे से तैयार होंगे दुनिया के मशहूर स्मारक
खिलमिल पार्क की असली कहानी इसकी दीवारों या रास्तों में नहीं, बल्कि उन चीजों में छिपी है जिन्हें आमतौर पर कबाड़ समझ लिया जाता है।

पार्क की थीम Waste to Wonder पर आधारित है। लोहे और दूसरे वेस्ट मैटेरियल को जोड़कर ऐसी संरचनाएं तैयार की जा रही हैं, जो देखने में मशहूर विश्व धरोहरों की याद दिलाती हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कारीगर इस काम में जुटे हैं। फरवरी 2026 की रिपोर्ट में बरेली और बंगाल से आए कारीगरों द्वारा लोहे के वेस्ट से एफिल टावर और स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसी संरचनाएं तैयार करने की जानकारी सामने आई थी।

यहां खास बात सिर्फ प्रतिकृतियां बनाना नहीं है। इसके पीछे एक संदेश भी है—अगर सोच बदल जाए तो बेकार चीज भी खूबसूरत और उपयोगी बन सकती है।
एक ही परिसर में दिखेंगे सात अजूबे
पार्क का सबसे बड़ा आकर्षण दुनिया के प्रसिद्ध स्मारकों की प्रतिकृतियां होंगी। उपलब्ध परियोजना विवरणों में ताजमहल, एफिल टावर, लीनिंग टावर ऑफ पीसा, पिरामिड, क्राइस्ट द रिडीमर और स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी समेत सात अजूबों को शामिल किए जाने की जानकारी है।
इन प्रतिकृतियों का उद्देश्य केवल लोगों को फोटो खिंचाने का मौका देना नहीं है। खासकर बच्चों और युवाओं के लिए यह दुनिया की प्रसिद्ध स्थापत्य धरोहरों से परिचित होने का एक सहज माध्यम बन सकता है।
सोचिए, औरैया से बाहर जाए बिना एक ही परिसर में ताजमहल से लेकर एफिल टावर तक देखने का अनुभव—भले ही वे असली नहीं, लेकिन उनकी कलात्मक प्रतिकृतियां जरूर होंगी।
औरैया की कहानी भी होगी पार्क की दीवारों पर
खिलमिल पार्क को केवल विदेशी स्मारकों का संग्रह बनाने के बजाय स्थानीय इतिहास और धार्मिक विरासत से जोड़ने की भी योजना है।
विरासत जोन में देवकली मंदिर, गौरैया मंदिर, संकट मोचन मंदिर और भारेश्वर मंदिर जैसी स्थानीय धार्मिक धरोहरों की प्रतिकृतियों का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े गेंदालाल दीक्षित और महात्मा गांधी के औरैया आगमन से जुड़े दृश्य भी प्रदर्शित करने की योजना बताई गई है।
यह हिस्सा पार्क को खास बनाता है। क्योंकि कोई भी शहर तभी अपनी पहचान मजबूत करता है, जब वह बाहर की दुनिया दिखाने के साथ अपनी कहानी भी लोगों को सुनाए।
बच्चों के लिए पार्क में होगा अलग संसार
अगर बड़े लोगों के लिए सात अजूबे और विरासत जोन आकर्षण होंगे, तो बच्चों के लिए अलग दुनिया तैयार की जा रही है।
किड्स जोन में झूले और फिसलपट्टी जैसे खेल उपकरण होंगे। इनका डिजाइन भी सामान्य नहीं रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इन्हें बस, ट्रक और जेसीबी जैसी आकृतियों में तैयार किया जा रहा है।
बच्चों के लिए यह सिर्फ खेलने की जगह नहीं होगी, बल्कि ऐसी जगह हो सकती है जहां खेलते हुए वे अलग-अलग आकृतियों और संरचनाओं को करीब से देख सकें।
इतिहास और सिनेमा का भी मिलेगा मेल
खिलमिल पार्क में सेल्फी प्वाइंट भी प्रस्तावित हैं। यहां स्थानीय बीहड़ और डाकू-पुलिस की लोकप्रिय छवि से जुड़े पात्रों के साथ फिल्मों के चर्चित किरदारों को भी थीम के रूप में शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है।
उपलब्ध विवरणों में फूलन देवी, निर्भय सिंह गुर्जर, पान सिंह तोमर के साथ शोले के ठाकुर और विजय तथा चुलबुल पांडेय जैसे फिल्मी पात्रों का उल्लेख है।
यह हिस्सा युवाओं के लिए खासा आकर्षक हो सकता है, हालांकि पार्क खुलने के बाद इन सभी प्रस्तावित थीमों का अंतिम स्वरूप ही स्पष्ट करेगा कि इन्हें किस रूप में प्रदर्शित किया गया है।
अलग-अलग राज्यों के कारीगर दे रहे हैं आकार
खिलमिल पार्क की एक और दिलचस्प बात यह है कि इसकी कलाकृतियों को तैयार करने में स्थानीय स्तर के साथ-साथ दूसरे राज्यों से आए कारीगर भी काम कर रहे हैं।
किसी के हाथों में लोहे के टुकड़े हैं, कोई पुराने सामान को जोड़कर विशाल ढांचा तैयार कर रहा है और कोई मंदिर की आकृति को आकार दे रहा है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट में बंगाल से आए कारीगरों द्वारा स्थानीय मंदिर की प्रतिकृति बनाने और बरेली के कारीगर द्वारा एफिल टावर तैयार करने का उल्लेख किया गया था।
यानी पार्क बनने की प्रक्रिया अपने आप में अलग-अलग जगहों की कला और हुनर को एक जगह ला रही है।
पार्क की योजना कितनी बड़ी है?
खिलमिल पार्क की लागत को लेकर अलग-अलग चरणों में अलग आंकड़े सामने आए हैं। शुरुआती योजना में करीब पौने पांच करोड़ रुपये के बजट की जानकारी दी गई थी। बाद में परियोजना से जुड़े निविदा और वित्तीय दस्तावेजों में अलग-अलग रकम सामने आई।
उत्तर प्रदेश नगर विकास विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक 18 जून 2026 को Waste to Wonder/खिलमिल पार्क के लिए 245.90 लाख रुपये यानी करीब 2.46 करोड़ रुपये की द्वितीय/अंतिम किश्त स्वीकृत की गई। वहीं परियोजना से जुड़े अन्य चरणों में इससे अलग राशि दर्ज हुई है।
इसलिए अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज रकम को जोड़कर एक ही “अंतिम परियोजना लागत” बताना उचित नहीं होगा।
सिर्फ पार्क नहीं, पर्यटन सर्किट की उम्मीद
खिलमिल पार्क की उपयोगिता केवल उसकी चारदीवारी के भीतर खत्म नहीं होती।
इसके आसपास मंगलाकाली मंदिर, यमुना का किनारा और औरैया की दूसरी धार्मिक-ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं। यही वजह है कि इसे भविष्य में आसपास के स्थलों से जोड़कर पर्यटन गतिविधियों को बढ़ाने की संभावना के रूप में देखा जा रहा है। एक रिपोर्ट में तत्कालीन जिलाधिकारी के हवाले से इसे पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की संभावना भी बताई गई थी।
अगर यह सोच जमीन पर सही तरीके से उतरी, तो एक परिवार एक दिन में पार्क के साथ आसपास के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों की सैर भी कर सकता है।
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार की संभावना
किसी भी नए पर्यटन स्थल का असर सिर्फ पर्यटकों की संख्या तक सीमित नहीं रहता। उसके आसपास चाय-नाश्ते की दुकानें, स्थानीय उत्पाद, छोटे कारोबारी, परिवहन और अन्य सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।
खिलमिल पार्क भी अगर नियमित रूप से पर्यटकों को आकर्षित करता है तो आसपास के लोगों के लिए छोटे स्तर पर रोजगार और कारोबार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
लेकिन इसके लिए पार्क का निर्माण पूरा होना ही पर्याप्त नहीं होगा। सफाई, सुरक्षा, पार्किंग, शौचालय, टिकट व्यवस्था, रोशनी और नियमित रखरखाव जैसी सुविधाओं को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
कब खुलेगा खिलमिल पार्क?
यही सवाल फिलहाल औरैया के लोगों के मन में सबसे ज्यादा है।
फरवरी 2026 में अधिकारियों की ओर से काम पूरा होने के बाद पार्क को जनता के लिए खोलने की बात कही गई थी। उस समय निर्माण कार्य काफी आगे बढ़ चुका बताया गया था।
लेकिन 26 जुलाई 2026 को प्रभारी मंत्री राकेश कुमार राठौर ने भी निर्माणाधीन खिलमिल पार्क का निरीक्षण किया। इससे स्पष्ट है कि उस तारीख तक पार्क को पूरी तरह तैयार होकर नियमित रूप से जनता के लिए खुला हुआ नहीं माना जा सकता।
इसलिए फिलहाल उद्घाटन की कोई तारीख या प्रवेश शुल्क को अंतिम जानकारी के रूप में बताना जल्दबाजी होगी।
खिलमिल नाम क्यों?
‘खिलमिल’ नाम अपने आप में पार्क के उद्देश्य की झलक देता है—एक ऐसी जगह जो लोगों से गुलजार हो, जहां बच्चे खेलें, परिवार समय बिताएं और दूर-दराज से आने वाले लोग कुछ नया देखकर लौटें।
बीहड़ के शांत इलाके में बन रहा यह पार्क अगर अपने उद्देश्य के मुताबिक विकसित हुआ तो इसका नाम केवल नगर पालिका की किसी परियोजना की सूची में नहीं रहेगा, बल्कि औरैया के लोगों की रोजमर्रा की बातचीत में एक नए घूमने-फिरने के ठिकाने के रूप में शामिल हो सकता है।
असली परीक्षा निर्माण पूरा होने के बाद होगी
किसी भी पार्क की खूबसूरती उद्घाटन के दिन सबसे ज्यादा होती है। असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है।
खिलमिल पार्क के मामले में भी यही सबसे बड़ा सवाल रहेगा कि तैयार होने के बाद इसकी कलाकृतियां कितने समय तक सुरक्षित रहती हैं, वेस्ट से बनी संरचनाओं का रखरखाव कैसे होता है, साफ-सफाई कितनी बेहतर रहती है और लोगों के लिए सुविधाएं लगातार उपलब्ध रहती हैं या नहीं।
अगर इन पहलुओं पर ध्यान दिया गया तो यह परियोजना सिर्फ फोटो खिंचाने की जगह नहीं, बल्कि औरैया के पर्यटन मानचित्र पर स्थायी पहचान बनाने वाला स्थल बन सकती है।
बीहड़ की खामोशी में एक नई हलचल
आज जिस जगह निर्माण मजदूर और कारीगर लोहे के टुकड़ों को जोड़कर आकृतियां तैयार कर रहे हैं, वहीं आने वाले समय में बच्चों की आवाजें, परिवारों की चहल-पहल और पर्यटकों की भीड़ सुनाई दे सकती है।
एक तरफ यमुना होगी, दूसरी तरफ बीहड़ का प्राकृतिक विस्तार और बीच में दुनिया के मशहूर स्मारकों की प्रतिकृतियां।
खिलमिल पार्क की असली खूबसूरती शायद इसी विरोधाभास में छिपी है—बीहड़ की जमीन पर मनोरंजन, कबाड़ से कला और स्थानीय इतिहास के बीच दुनिया को एक जगह समेटने की कोशिश।
औरैया के लिए यह सिर्फ एक नया पार्क नहीं, बल्कि अपनी पुरानी पहचान के बीच एक नई कहानी लिखने की कोशिश है। अब इंतजार इस बात का है कि निर्माण पूरा होने के बाद यह कहानी कितनी खूबसूरती से लोगों के सामने आती है।
औरैया टाइम्स अपडेट 📢
औरैया की हर बड़ी खबर सबसे पहले अपने WhatsApp पर पाने के लिए हमारे चैनल को फॉलो करें।

