औरैया: जनपद में जहां एक तरफ एलपीजी (LPG) गैस सिलेंडरों की किल्लत और बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ रखा है, वहीं दूसरी तरफ जिले का एक छोटा सा गांव आत्मनिर्भरता की एक अद्भुत मिसाल पेश कर रहा है। भाग्यनगर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाला ‘परवाहा’ गांव आज उन तमाम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए एक प्रेरणा बन गया है, जो पूरी तरह से सिर्फ एलपीजी गैस पर निर्भर हैं। इस गांव के कई घरों में पिछले करीब 10 वर्षों से मवेशियों के गोबर से तैयार होने वाली प्राकृतिक गैस (बायोगैस) के सहारे ही पूरी रसोई का कुशल संचालन हो रहा है।


15 घरों में सफलतापूर्वक चल रहे गोबर गैस प्लांट
लगभग 60 परिवारों की छोटी सी आबादी वाले इस परवाहा गांव में आधुनिकता और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतरीन संगम देखने को मिलता है। गांव के करीब 15 घरों में गोबर गैस प्लांट (Biogas Plant) सफलतापूर्वक स्थापित हैं। इन घरों की महिलाएं एलपीजी सिलेंडर का इंतजार करने के बजाय, अपने मवेशियों के गोबर का सदुपयोग कर खुद गैस तैयार करती हैं और उसी से परिवार के लिए स्वादिष्ट भोजन पकाती हैं। इससे न केवल एलपीजी पर उनकी निर्भरता लगभग खत्म हो गई है, बल्कि ईंधन पर खर्च होने वाले हजारों रुपयों की भारी बचत भी हो रही है।
रसोई में गैस और खेतों को मिल रही ‘जैविक खाद’
गोबर गैस संयंत्रों का यह फायदा केवल रसोई की आंच तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती के लिए भी एक बड़ा वरदान साबित हो रहा है। संयंत्र से गैस बनने के बाद जो अपशिष्ट (अवशेष) निकलता है, उसे ग्रामीण बिल्कुल बर्बाद नहीं करते। इस अपशिष्ट का उपयोग खेतों में उच्च गुणवत्ता वाली ‘जैविक खाद’ (Organic Fertilizer) के रूप में किया जा रहा है। इससे ग्रामीणों को दोहरा मुनाफा मिल रहा है—एक तरफ महंगे रासायनिक उर्वरकों (यूरिया/डीएपी) से छुटकारा मिल रहा है, तो दूसरी तरफ खेतों की उर्वरा शक्ति और फसल की पैदावार में भी इजाफा हो रहा है।



उपकरणों की कमी से आ रही दिक्कत, प्रशासन से लगाई गुहार
इस आत्मनिर्भरता की राह में अब कुछ तकनीकी रोड़े भी अटकने लगे हैं। समय बीतने के साथ-साथ गांव के कई गोबर गैस संयंत्र अब खराब होने लगे हैं या उनकी कार्यक्षमता कम हो गई है, जिससे ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इन बायोगैस संयंत्रों से जुड़े जरूरी उपकरण और स्पेयर पार्ट्स स्थानीय बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं।
इसके कारण खराब हुए प्लांट की मरम्मत कराने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए ग्रामीणों ने संबंधित विभाग और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि खराब संयंत्रों की मरम्मत के लिए मैकेनिक और जरूरी उपकरण आसानी से उपलब्ध कराए जाएं।
‘Auraiya Times’ परवाहा गांव के ग्रामीणों की इस शानदार पहल की जमकर सराहना करता है। सही मायने में यही ‘स्वच्छ भारत’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का असली जमीनी मॉडल है। यदि जिला प्रशासन, कृषि विभाग और नेडा (NEDA) थोड़ी सी दिलचस्पी दिखाएं और इन संयंत्रों के रखरखाव में सरकारी सहयोग प्रदान करें, तो परवाहा गांव का यह सफल मॉडल न केवल पूरे औरैया जिले, बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश के अन्य गांवों के लिए भी एक बड़ी प्रेरणा बन सकता है।
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