औरैया: 15 मार्च को मनाए जाने वाले ‘विश्व उपभोक्ता दिवस’ से ठीक पहले औरैया के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो मनमानी करने वाली बीमा कंपनियों के लिए एक कड़ा सबक है। अक्सर देखा जाता है कि भारी-भरकम प्रीमियम वसूलने के बाद जब क्लेम (दावा) देने की बारी आती है, तो बीमा कंपनियां तरह-तरह के बहाने बनाकर पल्ला झाड़ लेती हैं। लेकिन इस बार ‘स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी’ (Star Health Insurance) को अपना अनुचित रवैया बहुत भारी पड़ गया है। आयोग ने स्वास्थ्य बीमा का दावा गलत तरीके से खारिज करने पर कंपनी को ‘सेवा में कमी’ का दोषी मानते हुए लाखों रुपये के भुगतान का सख्त आदेश दिया है।


प्रीमियम लिया, लेकिन वक्त पर क्लेम कर दिया रिजेक्ट
यह पूरा मामला औरैया जनपद के ग्राम उसरारी के रहने वाले चंद्रशेखर उर्फ अनिल यादव से जुड़ा है। उन्होंने अपनी पुरानी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को 18,642 रुपये का भारी प्रीमियम देकर स्टार हेल्थ कंपनी में पोर्ट कराया था। दुर्भाग्यवश, दिसंबर 2024 में हृदय संबंधी गंभीर समस्या के चलते उन्हें लखनऊ के प्रतिष्ठित अपोलो मेडिक्स अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जहाँ उनकी हार्ट सर्जरी की गई। इलाज के बाद जब चंद्रशेखर ने अपने मेडिकल खर्च के लिए क्लेम दाखिल किया, तो स्टार हेल्थ इंश्योरेंस ने निहायत ही गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए दावा निरस्त कर दिया। कंपनी ने बिना किसी ठोस मेडिकल साक्ष्य के पीड़ित पर यह मनगढ़ंत आरोप लगा दिया कि उन्होंने जानबूझकर अपनी ‘बीमारी छिपाई’ थी।
अधिवक्ता संजीव पांडेय की पैरवी से कोर्ट में झुकी कंपनी
कंपनी की इस तानाशाही के खिलाफ पीड़ित ने न्याय की शरण ली। इस अहम मामले में उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता संजीव पांडेय ने चंद्रशेखर की ओर से प्रभावी पैरवी की। न्यायालय में साक्ष्यों के अवलोकन और जोरदार कानूनी जिरह के दौरान स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ऐसा कोई भी पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाई जिससे यह साबित हो सके कि परिवादी पॉलिसी लेने से पहले से बीमार था। जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की इस हरकत को सीधे तौर पर सेवा में गंभीर कमी माना और कंपनी के आधारहीन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया।
45 दिन में 5 लाख रुपये और ब्याज चुकाने का अल्टीमेटम
उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करते हुए आयोग ने स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को बेहद कड़ा आदेश जारी किया है। फैसले के मुताबिक, बीमा कंपनी को 45 दिनों के भीतर परिवादी चंद्रशेखर को 5,00,000 रुपये (पांच लाख रुपये) की बीमित धनराशि का अनिवार्य रूप से भुगतान करना होगा। इतना ही नहीं, इस पूरी राशि पर वाद प्रस्तुत करने की तिथि से 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी चुकाना होगा। इसके अतिरिक्त, ग्राहक को अनुचित मानसिक व शारीरिक कष्ट देने के लिए 10,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 10,000 रुपये का अलग से भुगतान करने का सख्त निर्देश दिया गया है।


‘Auraiya Times’ जिला उपभोक्ता आयोग के इस फैसले का पुरजोर स्वागत करता है। विश्व उपभोक्ता दिवस के मुहाने पर आया यह निर्णय आम नागरिकों के लिए न्याय का एक बेहद सकारात्मक और मजबूत संदेश है। यह फैसला साबित करता है कि अगर उपभोक्ता जागरूक हो और उसे सही कानूनी मार्गदर्शन मिले, तो बड़ी से बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों की मनमानी को भी कानूनी हथौड़े से तोड़ा जा सकता है।
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