यूपी शिक्षक भर्ती : उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान प्राथमिक शिक्षक भर्ती का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। समाजवादी पार्टी के विधायक अनिल प्रधान ने सदन में बेसिक शिक्षा विभाग की नीतियों और रिक्त पदों को न भरने पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने सरकार पर डेटा छिपाने और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने का गंभीर आरोप लगाया है।


1. “मंत्री जी देते हैं रटा-रटाया जवाब”
विधायक अनिल प्रधान ने सदन में तंज कसते हुए कहा कि जब भी प्राथमिक शिक्षक भर्ती को लेकर सवाल पूछा जाता है, तो मंत्री जी की ओर से हमेशा एक ही ‘रटा-रटाया’ जवाब आता है कि “हमारे पास पर्याप्त शिक्षक हैं और अनुपात बराबर है।” उन्होंने सवाल उठाया कि अगर शिक्षक पर्याप्त हैं, तो विभाग खुद समय-समय पर खाली पदों का डेटा क्यों जारी करता है?
2. पदों के आंकड़ों में उलझाई जा रही जनता?
सपा विधायक ने तथ्यों को सामने रखते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने खुद सदन में कभी 1 लाख 26 हजार तो कभी 85 हजार पद खाली होने की बात स्वीकार की है। लेकिन विडंबना यह है कि इन पदों को भरने के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने अभी तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है। लाखों योग्य अभ्यर्थी सड़कों पर रोजगार के लिए भटक रहे हैं, लेकिन सरकार भर्ती प्रक्रिया शुरू करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही।
3. ‘मर्जर’ नीति पर कड़ा ऐतराज: “दुर्भाग्यपूर्ण है यह फैसला”
अनिल प्रधान ने ग्रामीण क्षेत्रों के परिषदीय स्कूलों की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए ‘स्कूल मर्जर’ (विलय) की नीति को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा:


- दूरी की समस्या: गांवों के स्कूलों को आपस में मिलाया जा रहा है, जिससे गरीब बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच कठिन हो जाएगी।
- शिक्षा का अधिकार: सरकार की गलत नीतियों के कारण परिषदीय स्कूलों का अस्तित्व खतरे में है। स्कूलों को बंद करना शिक्षा के अधिकार का हनन है।
4. बुनियादी ढांचे पर सवाल
विधायक ने आरोप लगाया कि सरकार की सही नीति न होने के कारण सरकारी स्कूलों की हालत बदतर होती जा रही है। एक तरफ निजीकरण को बढ़ावा मिल रहा है, तो दूसरी तरफ गांव के गरीब बच्चों के स्कूलों पर ताले जड़ने की तैयारी हो रही है।
प्राथमिक शिक्षा किसी भी राज्य की नींव होती है। अगर 1.25 लाख से अधिक पद रिक्त हैं और सरकार केवल ‘अनुपात’ का हवाला देकर नई भर्ती से बच रही है, तो यह प्रदेश के लाखों TET/CTET पास युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। साथ ही, स्कूलों के मर्जर से ग्रामीण अंचलों में ‘ड्रॉपआउट’ रेट बढ़ने का खतरा भी बना रहता है।
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