Panchayat Chunav : पंचायत चुनाव को लोकतंत्र का सबसे बड़ा और ज़मीनी त्योहार कहा जाता है। गाँव में जब चुनावी बिगुल बजता है, तो हर नुक्कड़ और चौपाल पर बस एक ही चर्चा होती है— “इस बार कौन जीतेगा?” लेकिन एक आम वोटर या चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे उम्मीदवार के तौर पर, क्या आपको पता है कि पंचायत चुनाव की आधिकारिक प्रक्रिया कैसे काम करती है? चुनाव की तारीखों के ऐलान से लेकर जीतने वाले को सर्टिफिकेट मिलने तक किन-किन चरणों से गुज़रना पड़ता है?
- पंचायत चुनाव कौन कराता है?
- पंचायत चुनाव के मुख्य चरण (Stages of the Election Process)
- 1. परिसीमन और आरक्षण (Delimitation and Reservation)
- 2. मतदाता सूची (Voter List) का पुनरीक्षण
- 3. चुनाव की अधिसूचना और आचार संहिता (Notification & Model Code of Conduct)
- 4. नामांकन प्रक्रिया (Nomination Process)
- 5. पर्चों की जांच और नाम वापसी (Scrutiny & Withdrawal)
- 6. चुनाव चिह्न का आवंटन (Allotment of Symbols)
- 7. चुनाव प्रचार (Election Campaigning)
- 8. मतदान का दिन (Voting Day)
- 9. मतगणना और परिणाम (Counting and Results)
- निष्कर्ष


औरैया टाइम्स की इस विशेष इन्फॉर्मेशनल सीरीज़ के तीसरे भाग में आज हम आपको ‘पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया (Election Process)’ बिल्कुल आसान और सिलसिलेवार तरीके से समझाएंगे।
पंचायत चुनाव कौन कराता है?
सबसे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि देश में लोकसभा (सांसद) और विधानसभा (विधायक) के चुनाव ‘भारत निर्वाचन आयोग’ (Election Commission of India) कराता है। लेकिन पंचायत और नगर निगम के चुनाव कराने की पूरी ज़िम्मेदारी ‘राज्य निर्वाचन आयोग’ (State Election Commission) की होती है।
राज्य निर्वाचन आयोग ही चुनाव की तारीखें तय करता है, नियमों का पालन करवाता है और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराता है।


पंचायत चुनाव के मुख्य चरण (Stages of the Election Process)
पंचायत चुनाव रातों-रात नहीं होते, इसके लिए महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। इसकी पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से 9 चरणों में बँटी होती है:
1. परिसीमन और आरक्षण (Delimitation and Reservation)
चुनाव से कई महीने पहले सरकार और प्रशासन मिलकर ‘परिसीमन’ करते हैं। इसमें देखा जाता है कि किस गाँव की जनसंख्या कितनी बढ़ी है और क्या नए वार्ड बनाने की ज़रूरत है। इसके बाद आरक्षण (Reservation) तय होता है। ज़िला प्रशासन यह लिस्ट जारी करता है कि कौन सी सीट सामान्य (General), महिला (Women), ओबीसी (OBC) या एससी/एसटी (SC/ST) के लिए आरक्षित होगी।
2. मतदाता सूची (Voter List) का पुनरीक्षण
वोट डालने के लिए आपका नाम वोटर लिस्ट में होना ज़रूरी है। चुनाव से पहले BLO (Booth Level Officer) घर-घर जाकर सर्वे करते हैं। जो युवा 18 साल के हो गए हैं उनका नाम लिस्ट में जोड़ा जाता है और जिनकी मृत्यु हो गई है, उनका नाम काटा जाता है। इसके बाद फाइनल वोटर लिस्ट प्रकाशित की जाती है।


3. चुनाव की अधिसूचना और आचार संहिता (Notification & Model Code of Conduct)
जब राज्य सरकार चुनाव कराने की सिफारिश करती है, तब राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की ‘अधिसूचना’ (Notification) जारी करता है। इसमें चुनाव के हर चरण की तारीखों का ऐलान होता है।
- आचार संहिता: अधिसूचना जारी होते ही पूरे राज्य या ज़िले में ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू हो जाती है। इसके बाद सरकार कोई नई योजना या घोषणा नहीं कर सकती और न ही किसी अधिकारी का ट्रांसफर कर सकती है।
4. नामांकन प्रक्रिया (Nomination Process)
यह चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए सबसे अहम कदम है।
- चुनाव लड़ने के इच्छुक लोग ब्लॉक या तहसील मुख्यालय जाकर अपना नामांकन पत्र (Nomination Form) खरीदते हैं।
- फॉर्म में अपनी संपत्ति, आपराधिक रिकॉर्ड (यदि कोई हो), और शिक्षा का ब्यौरा देना होता है।
- साथ ही सरकार के खाते में एक तय जमानत राशि (Security Deposit) जमा करनी होती है। ‘नो ड्यूज’ (No Dues Certificate) जैसे कागज़ात भी लगाने होते हैं।
5. पर्चों की जांच और नाम वापसी (Scrutiny & Withdrawal)
नामांकन जमा होने के बाद ‘रिटर्निंग ऑफिसर (RO)’ सभी पर्चों की जांच करता है। अगर किसी के दस्तावेज़ फर्जी या अधूरे मिलते हैं, तो उसका पर्चा निरस्त (Cancel) कर दिया जाता है। इसके बाद उम्मीदवारों को अपना नाम वापस लेने के लिए 1 या 2 दिन का समय दिया जाता है।
6. चुनाव चिह्न का आवंटन (Allotment of Symbols)
जो उम्मीदवार मैदान में डटे रहते हैं, उन्हें चुनाव आयोग की तरफ से ‘चुनाव चिह्न’ (Election Symbol) बांटे जाते हैं। राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियों के निशान पहले से तय होते हैं, लेकिन निर्दलीय या पंचायत उम्मीदवारों को चुनाव आयोग अपनी लिस्ट में से चुनाव चिह्न (जैसे- चश्मा, ट्रैक्टर, कार, अनाज की बाली आदि) आवंटित करता है।
7. चुनाव प्रचार (Election Campaigning)
चुनाव चिह्न मिलने के बाद उम्मीदवार आधिकारिक तौर पर अपना प्रचार शुरू कर सकते हैं। वे पोस्टर, बैनर और जनसंपर्क के ज़रिए वोटरों से वोट मांगते हैं।
- नियम: मतदान शुरू होने के ठीक 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार पूरी तरह से बंद (शांत काल) कर दिया जाता है।
8. मतदान का दिन (Voting Day)
यह वोटरों का दिन होता है। गाँव के स्कूलों या पंचायत भवनों में ‘पोलिंग बूथ’ बनाए जाते हैं।
- ज़्यादातर राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश) में पंचायत चुनाव बैलेट पेपर (Ballot Paper) यानी मतपत्र के ज़रिए होते हैं, EVM से नहीं।
- एक ही बूथ पर वोटर को चार अलग-अलग बैलेट पेपर दिए जाते हैं (ग्राम प्रधान, वार्ड सदस्य, BDC और ज़िला पंचायत सदस्य के लिए) और उन पर मुहर लगाकर बैलेट बॉक्स में डालना होता है।
जानकारी के लिए (उत्तर प्रदेश में बैलेट पेपर के रंग):
- वार्ड सदस्य के लिए: सफ़ेद (White)
- ग्राम प्रधान के लिए: हरा (Green)
- क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC) के लिए: नीला (Blue)
- ज़िला पंचायत सदस्य के लिए: गुलाबी (Pink)
9. मतगणना और परिणाम (Counting and Results)
चुनाव खत्म होने के बाद सभी बैलेट बॉक्स को भारी सुरक्षा के बीच ‘स्ट्रॉन्ग रूम’ में रखा जाता है। तय तारीख पर ‘मतगणना’ (Counting) शुरू होती है।
- सभी उम्मीदवारों के एजेंटों के सामने वोट गिने जाते हैं।
- जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं, चुनाव अधिकारी (RO) उसे विजेता घोषित करता है और ‘जीत का प्रमाण पत्र’ (Winning Certificate) सौंपता है।
- अगर किसी उम्मीदवार को कुल पड़े वैध वोटों का एक निश्चित प्रतिशत (आमतौर पर 1/6 भाग) नहीं मिलता है, तो उसकी ज़मानत राशि ज़ब्त हो जाती है।
निष्कर्ष
पंचायत चुनाव की यह पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र की गहराई और ताक़त को दर्शाती है। परिसीमन से लेकर मतगणना तक का हर एक कदम यह सुनिश्चित करता है कि गाँव की जनता को बिना किसी डर और दबाव के अपना नेता चुनने का अधिकार मिले। एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में हमारा यह कर्तव्य है कि हम वोटर लिस्ट में अपना नाम ज़रूर जुड़वाएं और मतदान के दिन अपने मताधिकार का प्रयोग ज़रूर करें।
अगर आप भविष्य में प्रधान या BDC का चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं, तो औरैया टाइम्स की अगली पोस्ट ज़रूर पढ़ें, जिसमें हम बताएंगे कि “पंचायत चुनाव लड़ने के लिए क्या योग्यता (Age, Education) होनी चाहिए और कौन-कौन से ज़रूरी दस्तावेज़ (Documents) लगते हैं।”
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