औरैया: डिजिटल पेमेंट के इस दौर में ऑनलाइन धोखाधड़ी (Cyber Fraud) का शिकार होने वाले आम उपभोक्ताओं के लिए औरैया से एक बेहद राहत भरी और नजीर पेश करने वाली खबर सामने आई है। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (Consumer Court) ने बैंकिंग सेवाओं में बरती गई लापरवाही को बेहद गंभीरता से लेते हुए पीड़ित उपभोक्ता के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। आयोग के अध्यक्ष श्री जगन्नाथ मिश्र, सदस्य सुश्री अमिता निगम और श्री जितेन्द्र सिंह कुशवाह की संयुक्त पीठ ने स्थानीय एच०डी०एफ०सी० (HDFC) बैंक को स्पष्ट आदेश दिया है कि वह परिवादी (ग्राहक) के खाते से धोखाधड़ी कर काटी गई 60,000 रुपये की पूरी धनराशि ब्याज सहित वापस करे। इसके अतिरिक्त, बैंक की लचर कार्यप्रणाली के लिए उस पर मानसिक पीड़ा और वाद व्यय (मुकदमा खर्च) के रूप में कुल 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।


बिना ओटीपी और लेनदेन के कट गए थे 60 हजार रुपये
उपभोक्ता आयोग में न्याय की यह गुहार जनपद औरैया के बदनपुर निवासी मंजुल मयंक ने लगाई थी। मामले के अनुसार, परिवादी मंजुल मयंक का एच०डी०एफ०सी० बैंक की स्थानीय शाखा में एक बचत खाता संचालित है। पीड़ित ने आयोग को बताया कि बीते 3 नवंबर 2024 को उनके मोबाइल फोन पर यूपीआई (UPI) के माध्यम से खाते से 60,000 रुपये कटने का मैसेज अचानक प्राप्त हुआ, जबकि उस समय उन्होंने स्वयं किसी भी प्रकार का कोई वित्तीय लेनदेन (Transaction) नहीं किया था। अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई इस तरह लुटते देख पीड़ित ने तत्काल भारत सरकार की साइबर क्राइम हेल्पलाइन ‘1930’ पर कॉल करके शिकायत दर्ज कराई और स्थानीय पुलिस को भी सूचना दी। आरोप है कि पुलिस और साइबर सेल में शिकायत के बावजूद जब बैंक प्रबंधन ने पूरे छह माह तक इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की और अपने ग्राहक की कोई मदद नहीं की, तब हारकर पीड़ित ने न्याय के लिए जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
आयोग की तल्ख टिप्पणी: ‘पूंजी की सुरक्षा करना बैंक की जिम्मेदारी’
मामले की विस्तृत सुनवाई और दोनों पक्षों के साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद उपभोक्ता आयोग ने पाया कि बैंक अपने ही ग्राहक की जमा पूंजी की सुरक्षा करने में पूरी तरह से विफल रहा है। पीठ ने बैंकिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि ग्राहकों के रुपये और उनके खातों की डिजिटल सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर बैंक की होती है। यदि किसी ग्राहक के साथ कोई धोखाधड़ी या अनधिकृत लेनदेन होता है, तो बैंक को मूकदर्शक बने रहने के बजाय खुद सक्रिय होकर समुचित विधिक और तकनीकी कार्यवाही करनी चाहिए।
45 दिन का अल्टीमेटम, अधिवक्ताओं ने बताया इसे ‘मिसाल’
इन कड़ी टिप्पणियों के साथ, न्यायालय ने एच०डी०एफ०सी० बैंक को आदेशित किया है कि वह फैसले की तारीख से 45 दिन के भीतर उपभोक्ता को उसकी 60,000 रुपये की मूल धनराशि तथा उस पर नियमानुसार लगने वाला ब्याज अदा करे। इसके साथ ही, उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी के लिए 5,000 रुपये की क्षतिपूर्ति और 5,000 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में (कुल 10 हजार रुपये) भी बैंक को ही वहन करने होंगे।



इस महत्वपूर्ण फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए जिला उपभोक्ता आयोग के मध्यस्थता प्रकोष्ठ के सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव पांडेय ने कहा कि- यह निर्णय ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी (Cyber Crime) के बढ़ते मामलों में बेबस उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए एक बड़ी कानूनी मिसाल बनेगा।

